साईंखेड़ा नगर परिषद में नामांतरण मामला बना प्रशासनिक मनमर्जी का उदाहरण
नरसिंहपुर/साईंखेड़ा:- नगर परिषद साईंखेड़ा में कानून और नियमों के बजाय मनमर्जी चलने के आरोप एक बार फिर सामने आए हैं। इसका ताजा और जीवंत उदाहरण भूखंड नामांतरण से जुड़ा मामला है, जिसने नगर परिषद की कार्यप्रणाली, संवेदनहीनता और कथित असत्य आचरण को सार्वजनिक रूप से उजागर कर दिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार आवेदक नीरज कुमार राय, आत्मज गिरीश कुमार राय ने दिनांक 24 मार्च 2025 को नगर परिषद साईंखेड़ा में अपने भूखंड के नामांतरण हेतु आवेदन प्रस्तुत किया था। आवेदन के साथ सभी आवश्यक व वैध दस्तावेज संलग्न किए गए। इसके लिए आवेदक द्वारा विविध रसीद बुक क्रमांक 13 से क्रमशः रसीद क्रमांक 68 के माध्यम से ₹200, 69 से ₹1000, 70 से ₹200 तथा 71 से ₹1000 की विधिवत शुल्क राशि जमा की गई।
नियमों के अनुसार भूखंड नामांतरण की प्रक्रिया 15 से 30 दिवस के भीतर पूर्ण की जानी चाहिए, किंतु इसके विपरीत करीब 9 माह बीत जाने के बाद भी फाइल को जानबूझकर लंबित रखा गया। बार-बार संपर्क और प्रतीक्षा के बावजूद जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो आवेदक को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181 का सहारा लेना पड़ा।
मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायत 2 दिसंबर 2025 को लेवल-3 अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत हुई। इस पर मुख्य नगर पालिका अधिकारी, साईंखेड़ा द्वारा 19 एवं 23 दिसंबर 2025 को दिए गए प्रतिवेदन में यह उल्लेख किया गया कि “नामांतरण प्रक्रिया अध्यक्ष महोदय की सक्षम स्वीकृति उपरांत पूर्ण की जाएगी।” इस कथन ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार भूखंड नामांतरण एक शुद्ध प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसमें न तो नगर परिषद अध्यक्ष की अनुमति का प्रावधान है और न ही किसी जनप्रतिनिधि के हस्ताक्षर की आवश्यकता। ऐसे में “अध्यक्ष की स्वीकृति” किस नियम, किस धारा और किस अधिकार के अंतर्गत जोड़ी गई, यह गंभीर प्रश्न बना हुआ है।
मामले को और भी चौंकाने वाला बनाने वाला तथ्य यह है कि कागजी कार्रवाई में आवेदक को “संतुष्ट” दर्शाते हुए शिकायत को “विलोपित योग्य” घोषित कर दिया गया, जबकि वास्तविकता यह है कि नामांतरण की प्रक्रिया आज तक पूरी नहीं हुई। ऐसे में जब कार्य ही नहीं हुआ, तो शिकायतकर्ता के संतुष्ट होने का दावा किस आधार पर किया गया?
यह प्रकरण केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से गुमराह करने और जनहित मंच पर असत्य प्रस्तुत करने का गंभीर आरोप अपने आप में समेटे हुए है। यह घटना नगर परिषद की कार्यशैली, जवाबदेही और पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच नहीं की गई, तो यह मानना पड़ेगा कि नगर परिषद साईंखेड़ा में कानून और नियम केवल कागजों तक सीमित हैं, जबकि वास्तविक संचालन सत्ता धारियों की इच्छा और मनमर्जी से हो रहा है।
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